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Saturday, May 7, 2011

Hath Maa Ka..

जख्म जो लगा मुझे वो, एक पल मे भर गया ।
हाथ माँ का घाव पर, कुछ ऐसा असर कर गया ।।
था मेरे सीने मे दर्द, दुनिया भर के बोझ का ।
गोद मे सर रखा माँ की, उतर गया उतर गया ।।
फूल सा है दिल भी उसका, फूल से है हाथ भी ।
छुआ जहाँ-जहाँ से उसने, निखर गया, निखर गया ।।
वो गोद है जैसे खुदा की, भगवान् का सा रुप है ।
पाया है जिसने प्यार माँ का, अजर गया, अमर गया ।।
हारकर लौटा नही, प्यार हो या जंग हो ।
घर से वो,चलने से पहले, पाँव जो छूकर गया ।।
'निर्मल' सहारा है प्यार माँ, का एक ही जहान् मे ।
मिला जिसे उस शक्स पर, जैहर बेअसर गया ।।

* * *

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