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Monday, August 26, 2013

तूफ़ान ज्ञान का...



चीरकर अँधेरे को कारवां बना ले तू। 
फूल से इक जोश को सीने में खिला ले तू।। 

अपनी कलम से जोडकर तुफ़ान ज्ञान का। 
फिर उसी तूफ़ान को जैह्न पर सजाले तू।। 

बनकर लैहर ऊंची सी तेज़ बह निकल। 
साथ अपने अज्ञान को डूबो ले और बहा ले तू।। 

बनकर उत्तर  का तारा तू नभ पर चमक। 
डराकर डर को आँख से आँख अब मिला ले तू।। 

तू है किरण अँधेरे में, उजाले में सूरज है तू। 
प्यासे को पानी है तू , खुद को ये समझाले तू।। 

दूरी नहीं जो तय न हो, मंजिल नहीं जो तेरी नहीं। 
खुद को एक सफलता का रोग सा लगा ले तू।। 

स्याहि नहीं कलम में तेरी , अमृत, और जैहर भी है। 
अच्छों के लिए अच्छा है तू बुरों को मार डाले तू।। 

ज्ञान की तलवार ले और काट दे अज्ञान को। 
काले किताबी अक्षरों को अब तो आजमाले तू।। 

फूल तू बन जायेगा , पत्थर पर खिल जायेगा। 
पडकर प्रभु के प्रेम में , नभ पर खुद को चमकाले तू।।

बड़ा तू होशियार है और शेर पर सवार है।
धडकनों के शोर से दुश्मन को हरा डाले तू।।














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