Labels

Saturday, May 11, 2013

हाथ माँ का...






जख्म जो लगा मुझे वो, एक पल मे भर गया ।

हाथ माँ का घाव पर, कुछ ऐसा असर कर गया ।।


था मेरे सीने मे दर्द, दुनिया भर के बोझ का ।

गोद मे सर रखा माँ की, उतर गया उतर गया ।।


फूल सा है दिल भी उसका, फूल से है हाथ भी ।

छुआ जहाँ-जहाँ से उसने, निखर गया, निखर गया ।।


वो गोद है जैसे खुदा की, भगवान् का सा रुप है ।

पाया है जिसने प्यार माँ का, अजर गया, अमर गया ।। 


हारकर लौटा नही, प्यार हो या जंग हो ।

घर से वो,चलने से पहले, पाँव जो छूकर गया ।।


'निर्मल' सहारा है प्यार माँ, का एक ही जहान् मे ।

मिला जिसे उस शक्स पर, जैहर बेअसर गया ।।



*******



No comments:

Post a Comment